Thursday, November 27, 2014

अजीब उलझन :- 
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  वाकयी ये एक अजीब उलझन हैं कि ,मन में आये हुए विचारों को कहाँ लिपि बद्ध  किया जाये या सरल भाषा में  कहूँ कि  लिखा जाये । कागज पर लिंखूं तो लोग कहते हैं कि "यार किस दुनिया में रहते हो .... ब्लॉग लिखते हो तो उस पर लिखो न " । कहते तो वो लोग भी ठीक रहे  हैं…पहले कागज पर लिखूं फिर ब्लॉग पर टाईप  करूँ … ये भी दोहरा काम हैं … सिधे क्यों न लिखा जाये । 
     लीजिये साहब हमने सोच लिया आज शहर जाकर …… (मतलब  .... अरे भाई हम रहते तो अपने गॉव में  हैं जँहा इंटर नेट की सुभिधा नहीं हैं , तो कैसे लिखेंगे  … ) लिखेंगें । कंप्यूटर  ऑन  किया …… ब्लॉग बाली  साईट खोली  … और अपने ब्लॉग पर साइन इन किया … लिखने बाला  पृष्ठ खोला .... कुर्सी पर सीधे बैठे ……  सीधे का मतलब कमर को तक्क सीधा कर के वैठना। … अरे भैया हमने एक अख़बार में  पड़ा था कि  जो लोग कुर्सी पर कमर कमान बना कर आराम  …… मतबल काम करते हैं ,वो बुढ़ापे में  बहुत पछताते हैं। । कमर की हड्डी टेडी हो जाती है .| डाक्टर लोग बहुत पैसा एठते हैं .... दुनिया भर की लाल पिली दवाइयाँ खानी  पड़ती हैं और एक दो साल बाद कहते हैं कि आप को तो" इस्पान्ड लाईटिस " हो गया हैं । फलां  फलां     ……  , हड्डियों की कसरत कराने वाले डॉक्टर  से मिलो  ....... वो भी पैसे ऐठेगा …… फिर कोई बाबा रामदेव की शरण में  जाने को कहेगा  …… अरे इत्ता  झेलने से पहले ही सुधर जाएँ तो का जाता है ,कमर तो अपनी हैं  .......इस लिए भैया हम कमर तक्क कर के वैठ  गए । 
       का कह रहे हो , हमारी भाषा को क्या हुआ , अरे भाई हम कितने ही पढ़ लिख गए हो ,शहर में  रहलिये हो पर मातृ  भाषा का गवई  अन्दाज थोड़े ही भूल जायेंगे । जाने अनजाने ये तो होगा ही …… अरे इसी भाषा से ही तो हम जिंदगी का क ,ख, ग , सीखे हैं । ये भाषा हमारे खून में  हैं। …… ये हमको हमारे होने का एहसास कराती हैं । इसी से हमारे अपने ,अपने बने हुए हैं । जब हम अपने बड़ों से सुबह सुबह राम राम करते है तो उन का प्यार भरा स्नेहिल हाथ हमारे सर पर होता है , आह मत पूंछो कितने  आनन्द और सुख की अनुभूति होती है … जब राम राम के बाद ताई कहती है …… अरे लल्ला कब आये , वैठो , चाह  पीओ ,… कैसे हो ,बाल गोपाल कैसे हैं । बस जीवन जिवंत हो उठता हैं ……… इस स्नेह से इक नई ऊर्जा का संचरण हो जाता है इस देह में  । क्या ये जादू  नमस्ते , या गुड मॉर्निग में  हैं । एक सीधी सी औपचारिकता ....... और सीधे रास्ते …… न अपनी ख़ुशी का कोई जिक्र और न दूसरे के गम से कोई वास्ता । वही  भाग दौड़ से जगती  सुबह और भागते भागते ढलती  शाम । इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी  में  अगर दो चार पल सकून  के मिलते हैं तो इसी भाषा के अपने पन  की वजह से,वरना  किस को किस की पड़ी । मेरे मित्तरों भाषा से ही जज्वात बयां होते हैं। ……नहीं तो हम जानवरों के दुःख दर्द के भी साझेदार न होते ।
          अरे छोडो  ……। कहाँ से कहाँ आ गए ....... बात कर रहे थे अपने लिखने की , सीधे तक्क वैठ  गए , उंगलिुओं को दो चार बार चटकाया और अब तैयार लिखने को  …… उंगलिया क़ी -बोर्ड पर रखी  ………। ………………अरे धत्त्तेरेकी  ....... का लिखने वैठे थे , का सोच के आये थे  …… भूल गए ना । बहुत अच्छा सोचके आये थे , कभी कोई काम वाला ,किसी ने आवाज दे ली ,और तो और आप ने भाषा के चक्कर में  हमको फसा दिया । लो करलो बात। .... सब भूल गए ,बहुत मन से सोच के आये थे आज तो यारों की बात मान ब्लॉक  पर ही लिखेंगे  .... लिख लिया । 
            बहुत उलझन है भाई जभी तो हम कहते हैं कि  अपनी तो कागज और कलम ही ठीक हैं जब मन में  विचार आया झट लिख डाला  …… अरे न जाने दूसरा विचार पहले को हटा खुद घुसड़  जाये ....... जैसे हमारे साथ अभी हुआ , लिखने कुछ आये थे और लिख क्या गए । हाँ बताये देते हैं ,अब हम से मत कहना कि  सीधे ब्लॉक  पर लिखो , उलझा दिये ना । जबहि  हम कहते  हैं  …………।
                                                         अजीब उलझन हैं ।
                                           
                                                                                राम -राम भाइयो कल फिर सोच के आयेँगे  ।
         
 


Friday, September 12, 2014

कुछ दिलचस्प उत्पादों के नाम, जो छा गये बाजारों में...

व्यापार के मामले में कहा जाता है कि अपने अच्छे उत्पादों और वाजीब दाम में उत्कृष्ठ सेवाओं से ही कोई कंपनी शीर्ष पर पहुंच सकती हैं, परन्तु काम करने के दौरान हमें व्यावहारिक जीवन में कई छोटी बडी समस्याएं आती हैं,  और उनको भी समान दृष्टि से देखते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहना और अपने उत्पाद को और ज्यादा अच्छा व विशिष्ट बना डालना सचमुच बहुत बडी बात हैं |
बडे महान थे वे लोग जिन्होनें अपने जीवन मे इतना श्रम किया, इतना श्रम किया कि उनके उत्पाद ही अपने आप में ब्रांड हो गये | इतने बिके, इतने बिके की जन जन की जुबान पर उन प्राडक्टस के नाम हैं | वेसे ये बडी ही छोटी लिस्ट हैं, बाकी यूं तो दुनिया में ए॓से उंचाईयों को छूने वाले उत्पाद और कंपनीयों के काफी सारे नाम हैं | तो यहां प्रस्तुत है कुछ ए॓से ही उत्पादों की एक सू्ची |
कुछ दिलचस्प उत्पाद जो इतने चले कि अपने आप में ब्रांड हो गयेः
डालडाः डालडा का वनस्पति घी किसे याद नहीं होगा, कंपनी के इस उत्पाद को लोगों नें सिर आंखों पर चढ़ाया, एक जमाने मे डालडा वनस्पति घी इतना बिका की सारे रिकार्ड टूट गये, आज भी कोई महिला वनस्पति घी लेने बाजार जा रही होती है …. चाहे वो कोई भी कंपनी का वनस्पति घी खरीदने जा रही हो पर

surf
पडोसन से यही कहेगी डालडा लेने जा रही हूं |

सर्फः सर्फ कपडों की धुलाई का पाउडर हैं और इस उत्पाद की ए॓सी धूम है कि ये नाम से ही चलता हैं,  आज भी कोई व्यक्ति वाशिंग पाउडर लेने बाजार जा रहा होता है …. चाहे वो कोई भी कंपनी का वाशिंग पाउडर खरीदने जा रहा हो पर कहेगा यही कि सर्फ लेने जा रहा हूं |
मोबिल आयलः बोलचाल में मोबिल आयल जिसे कहा जाता हैं ये एक कंपनी का तेल होता था, पर अभी कोई भी कार सर्विस कराये तो मिस्त्री मोबिल आयल कौनसा डालने वाला है ये जरुर पूछता हैं |
एस्पिरिनः एस्पिरिन तुरंत राहत देने वाली दर्दनिवारक गोली होती हैं, पर आजकल कोई भी सरदर्द बदनदर्द होने पर चाहे और किसी ब्रांड की गोली भी खा रहा हो, कहेगा यही कि एस्पिरिन ली है, अब ठीक हो जाउंगा | ए॓से और भी उदाहरण हैं, जैसे कोई व्यक्ति बहुत से सवाल करता हो, दिमाग खाता हो तो मित्र लोग उसे झंडु कहते है या  फिर कहेंगे कि ये लो इस एनासिन की ही कमी थी, अब ये भी आ गया |
बैंड एडः ये एक पट्टी होती हैं जो कि छोटी मोटी चोट लगने पर चिपका दी जाती हैं अब चाहे कोई भी ब्रांड की पट्टी बच्चों को लगाई जा रही हो पर लोग बोलचाल की भाषा में कहते यही हैं कि बच्चे को बैंड एड लगवा के आया हूं |
जीपः जीप हकीकत में एक वाहन कंपनी हैं, पर चौपहिया आफ रोडर सवारी को बोलचाल की भाषा में जीप ही कहा जाता रहा है |
निरमाः ए॓सा ही वाशिंग पाउडर निरमा के साथ भी हैं, निरमा का नाम आते ही कोई भी वाशिंग पाउडर निरमा ही याद करेगा, अब चाहे निरमा नाम से ही कोई बडे कालेज या कंपनीयां भी चल रही हो पर निरमा एक वाशिंग पाउडर का पर्याय बन चुका हैं |

i-pod
आई पोडः भारतीय बाजारों में आई पोड, यानी कोई भी एम पी थ्री प्लेयर जिस पर गाने सुने जा सकें | अक्सर एप्पल के प्राडक्ट कुछ महंगे होते है और ए॓से में चाईनीज एम पी थ्री प्लेयर भी बाजारों में बिकते हैं, पर बच्चे पूछते यही हैं कि भैया आई पोड है क्या ? ए॓सा ही कुछ सोनी कंपनी के वाकमेन के साथ भी है, सोनी ने अपने कैसेट प्लेयर का नाम वाकमेन रक्खा था पर अब कोई व्यक्ति चलते फिरते हुए संगीत सुनने वाला कोई भी यन्त्र खरीदे, कहेगा यही कि वाकमेन लाया हूं |

जिलेट रेजरः जिलेट एक बहुत बडी कंपनी है जो शेवर रेजर आदि बनाती हैं और रेजर करके एक रेडी शेवर उन्होने निकाला था, अब कोई भी डाढ़ी बनवाने का उस्तरा खरीदे बोलेगा यही कि रेजर लाया हूं |
बिस्लरीः बिस्लरी का मिनरल वाटर नाम से शुद्ध पानी आता हैं और ये हर छोटी मोटी दुकान पर सुलभ उपलब्ध हैं , अब ये मिनरल वाटर का पर्याय बन चुका हैं, कवि लोग कहते हैं ना कि नेता पीये बिस्लरी, और हम पीये नलके का गंदा पानी |
कोलगेटः कोलगेट एक प्रसिद् टूथपेस्ट हैं, जो किसी भी टूथपेस्ट कंपनी से पीछे नहीं हें, कोई किसी भी कंपनी का टूथपेस्ट लेने जा रहा हो वह कहेगा यही कि भई कोलगेट लेने जा रहा हूं |
जिरोक्स: जिरोक्स एक कंपनी है जो कि प्रिन्टर, फोटोकोपी मशीन आदि बनाती है, फोटोकोपी मशीनें जिरोक्स की इतने प्रचलन में आयी कि कोई भी फोटोकोपी कराने जाता हो कहता है कि जिरोक्स कराने जा रहा हूं |
वेसलीनः वेसलीन का नाम आते हैं हमें पेट्रोलियम जैली याद आती हे,अब बाजारों में चाहे कितने ही अलग अलग ब्रांड के वेसलीन पेट्रोलियम जैली मिलते हों पर हमें तो बस वेसलीन ही चाहिये होता हैं|
डनलपः आज भी कई लोग गद्दीदार सोफे पर बैठते ही कहते है क्या बात है, ए॓सा नरम सोफा है जेसे डनलप का गद्दा हों | डनलप आराम व लग्जरी का प्रतीक बन चुका हैं |  डनलप नाम से पहले टायर आते थे |

Friday, September 5, 2014

दिल की किताब :-

दिल की किताब :-
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" आप भी क्या सोच रहे होंगे कि  मैंने कैसा शीर्षक लिया हैं ।जी हाँ एक ही शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं, और समझ ने वाले अपने हिसाब से समझते है । यहाँ मैं एक ऐसी किताब के बारे में  बता रहा हूँ , जिसको इस भूलोक के किसी लेखक ने नहीं लिखा है । इसे पड़ने के लिए किसी भाषा ज्ञान की जरूरत नहीं । एक अनपढ़ भी इसे पड़  सकता है । बिना आखों बाला भी पढ़ सकता है । इसका लेखक संसार का पालन हार , सृष्टि का रचियता है । 
       इसे  अगर  युवा पढ़ेगा तो उसे भी आनंद की अनुभूति होगी , अगर मध्य वय पढ़ेंगे  तो असीम संतोष की प्राप्ति होगी , और वृद्ध पढ़ेंगे  तो असीम आनंद, संतोष ,और सुख की प्राप्ति होगी । हरेक के  अपने- अपने अर्थ होंगे , अलग -अलग अनु -भूतियां होंगी । इसे "हृदय की किताब " भी कह सकते हैं । 
         
             इसमें लिखा है - सबसे पहले अपनी आँखे बंद कर पहचानो तुम कौन  हो ।
                                  - अपने अंदर के जीवन को महसूस करो । 
                                  - अपने अंदर के आनन्द को खोजो , सच्चा आनन्द , शारीरिक आनन्द  से इतर । 
                                  - अपने अंन्दर के करिश्माई शक्तियो को खोज निकालने का  मार्ग । 
                                  - एक शब्द "प्रेम " कितने अर्थ है इसके ,समझो ,पहचानो , करो ,बांटो ।
                                  - तुम्हरे अंदर ही तुम्हरी दिव्यता है। 
                                  - तुम्हारा गुरु तुम्हारा हृदय ही है इसकी आवाज को कभी अनसुना न करो , फिर
                                     देखो जीवन के हर क्षेत्र में  सफलता तुम्हरे  साथ होगी । 
 
किसी पुस्तक के पन्ने  पलटते रहो तो एक -एक करके सारे  पन्ने पलट जायेंगे , इन्हें फिर बापस पलट  सकते है ।  परन्तु हृदय की किताब के पन्ने बापस नहीं पलटे जासकते । इसे पढ़ना  है तो दिल की भाषा सीखो । जिस दिन हृदय की भाषा समझ आने लगेगी , उस दिन ये भी समझ में आने लगेगा कि  जीवन कितना अनमोल है । सौभाग्य है कि हमें ये जीवन मिला । इस दिल ,हृदय की किताब को अपना गुरु बनाओ ,मार्गदर्शक  बनाओ । हृदय से निकला हर भाव सत्य है , परमात्मा के प्रेम की भाषा है , उसका आदेश है , उसे बस समझना है । ये तभी संभव  होगा जब हम इस किताब को पढ़ना सीख  जाएगें ।   
                               

Thursday, September 4, 2014

कर्म करो..… पर विचार कर :-

कर्म करो..… पर विचार कर :-

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मनुष्य कर्मशील प्राणी है । वह जैसा कर्म करता है , उसे वैसा ही फल मिलता है । जब हम गलत काम करते है तो उसका गलत नतीजा भी हमें अवश्य भुगतना पड़ता है । इस लिए कहा गया है कि अच्छे काम करो । उनका परिणाम भी सुखद होता है । 
भगवान  बुद्ध ने कर्म के आधार पर मनुष्य के चार प्रकार बताये है । कथा आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ , 
एक वार प्रवचन के उपरांत एक जिज्ञासु ने भगवान  बुद्ध से पूंछा " आप ने कहा कि  मनुष्य चार प्रकार के होते है , कृपा समझाएं ?"
    बुद्ध ने उत्तर दिया , " मनुष्य कर्म से चार प्रकार के होते है - एक , तिमिर से तिमिर में  जानेवाला ;दूसरा , तिमिर से ज्योति की ओर  जाने वाला ; तीसरा , ज्योति से तिमिर की ओर  वाला ; और चौथा , ज्योति से ज्योति में  जाने वाला । 
    यदि कोई मनुष्य चाण्डाल , निषाद आदि  हीन कुल में जन्म ले और जन्म भर दुष्कर्म करने में बिताये , तो उसे मैं "तिमिर से तिमिर  में जाने वाला "कहता हूँ । 
   
   यदि कोई मनुष्य हीन कुल में जन्म ले तथा खाने - पीने की तकलीफ होने पर भी मन - वचन - कर्म से सत्कर्म का आचरण करे , तो मैं ऐसे मनुष्य को "तिमिर से ज्योति में  जाने वाला " कहता हूँ । 
   
   यदि कोई मनुष्य महा कुल में  जन्म ले , खाने -पीने की कमी न हो , शरीर भी सुन्दर ,रूपवान ,बलवान हो , किन्तु मन , वचन , कर्म से दुष कर्मी हो ,दुराचारी हो , तो मैं उसे  "ज्योति से तिमिर में जाने वाला " कहता हूँ । 
    किन्तु जो मनुष्य अच्छे कुल में जन्म लेकर सदैव सदाचरण ,सत  कर्म की साधना करता हो , तो मैं उसे "ज्योति से ज्योति में  जाने वाला " मनुष्य मानता हूँ । 

इस लिए मित्तरों मेरा तो यही निवेदन है कि  कर्म तो हमें करना है पर करते समय सोचना भी है , विशेष ध्यान भी रखना हो किस कर्म से हम किस श्रेणी के मनुष्य बन जायेंगे । इस भू  लोक पर ,हमारे जाने के बाद , क्या रह जायेगा ? रह जायेगा तो हमारी मनुष्यता की श्रेणी , हमारे दुवारा किये कर्मो की विवेचना । 
      एक बात और जब हम एक सामाज का हिस्सा हैं तो इसको भी हमें अपने कर्मो से साधना होगा , न तो गलत करेंगे  और न ही होने देंगें । हम गलत कर्म नहीं करते ,लेकिन गलत लोगों का विरोध नहीं करते तो ये भी गलत होगा । इसका फल  कईबार बहुत घातक  होता है । समाज को बुरे लोग इतना नुकसान नहीं पहुचाते जितना तटस्थ या निष्क्रिय लोग पहुंचाते है । 
       इस लिए उट्ठो  जागो सोचो समझो और कर्म किये जाओ। … 
       अपनी मनुष्यता की श्रेणी का हमेशा ध्यान रहे । 
      जड़ता को छोडो। … विनाशी नहीं रचनाकार बनो। … 
      हमें आज सवार कर आने वाली संतति को नया कल देना है । 
                                            । । इति  । ।    

Saturday, March 3, 2012

अण्डों की मार
==============एक खबर :- "अंडों की मार से बचने के लिए छिपे सरकोजी " अरे ये क्या महामहिम आप अंडों से ही डर गये , ये आपने क्या किया ? अपने दुर्भाग्य को आपने गले लगालिया| अरे भारत आकर देखिये ,यहां के नेता किसी मार से नही डरते ,चाहे वो सदन की कुर्सी ,पंखा या माइक या पुलिसिया डंडे की मार हो ,सब कुछ झेलने में माहिर है और इसे अपनी वीरता समझते हैं | और अगर पब्लिक से इनको जूता ,चप्पल , थप्पड़ खाने को मिलजाए तो उसे ये अपना सौभाग्य समझते हैं | भगवान के परसाद से इनको इतनी आनन्द की अनुभूति नहीं होती जितनी जूता ,चप्पल , थप्पड़ खाने में होती हैं | मैं तो यही कहूँगा कि आपने अपना भविष्य ख़राब करलिया ,राजनीति छोड़ दीजिये , इस क्षेत्र में जो डर गया समझो मर गया ,जो झेल गया समझो सात पीड़ियाँ तार लेगया| अगर मेरी बात पर विश्वास ना हो तो भारत आकर लोगों से पूछ लो , बच्चा -बच्चा सारा इतिहास बता देगा |  जब ही तो हम कहते हैं "मेरा देश महान " | जये हिंद ||  

Friday, March 2, 2012

mere sath chal: आओ ! कचरा करें :-

mere sath chal: आओ ! कचरा करें :-: आओ ! कचरा करें :- ============================ दोस्तों आदमी और कचरे का संबंध काफी अटूट है ।आदमी है तो कचरा होना लाजमी है । मच्छर मलेरिया फ...

आओ ! कचरा करें :-

आओ ! कचरा करें :-
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दोस्तों आदमी और कचरे का संबंध काफी अटूट है ।आदमी है तो कचरा होना लाजमी है । मच्छर मलेरिया फैलाता है ,मक्खी हैजा ,चूहा प्लेग फैलाता है ,तो आदमी कचरा ।बल्कि कहना चाहिए कि मनुष्य तो इन से भी दो कदम आगे है ।कचरा करना तो आदमी कि जन्म जात प्रवर्ति है ।हिमालय कि चोटियाँ इस बात कि साक्षी है ।जब तक वे आदमी की पहुच से दूर रहीं ,स्वच्छ बनी रहीं ।परन्तु जब से आदमी को पर्वतारोहण का शौक चर्राया तब से इन को भी नहीं छोड़ा ।फिर कचरा भी कैसा -कैसा ? प्लास्टिक के डिब्बे ,पालीथीन की थैलियाँ , इत्यादि जिनको प्रकर्ति भी  ठिकाने नहीं लगा सकती ।
      यह कितनी अजीब बात है कि जो व्यक्ति जितना अधिक साफ -सफाई पसंद है वह उतना ही अधिक गंदगी फैलाता है ।रोज -रोज नहाने वाला ,कभी कभार नहाने वाले कि अपेक्षा ज्यादा पानी गन्दा करता है ।नहाने -धोने के लिए साबुन ,शैम्पू और डिटरजेंट का उपयोग करने वाला सादा पानी से नहाने -धोने वाले के मुकाबले पानी को ज्यादा ख़राब तरीके से गन्दा करता है । प्रसाधन सामग्री का प्रचुर प्रयोग पर्याप्त प्रदुषण पैदा करता है । इन वस्तुओं के निर्माण के समय फैक्ट्रियां भी गंदे अवशिष्ट फैंकती है । फिर इन की पैकिंग में लगने वाला कागज ,गत्ता ,पन्नी  आदि भी तो अंतत: कचरा बनता है ।
        आज का युग ओध्योगीकरण  का है ,जिसका मूर्त रूप है निरंतर धुंआ उगलती मिलें, कारखाने ।जहां जितने अधिक कारखाने ,वह देश उतना ही उन्नत ।इसका परिणाम तो आप जानते ही है - अधिक कचरा और अधिक प्रदूषण ।इसका अर्थ यह हुआ कि कचरा प्रगति का प्रतीक और समुन्नत होने का लक्षण है ।मेरे विचार से किसी देश कि उन्नति का स्तर इस बात से आंका जाना चाहिए कि वहां प्रति व्यक्ति प्रतिदिन / प्रतिवर्ष कितना कचरा उत्पन्न करता है ।
          एक बात और ।सभ्य आदमी अपने कचरे को अपने से दूर दूसरों के इलाके में फैकता है ।जो जटिल गंवार है , वे गंदगी के बीच रहते है ,घर का कचरा घर के सामने ही डाल देते है ।परन्तु जो अपेक्षाकृत सभ्य हैं , वे अपना कचरा पड़ोसी के दरवाजे या दो -चार मकान आगे या सार्वजनिक स्थान पर डाल देते हैं ।आबादी बढने से हालात यह है कि आप कचरा कहीं भी फैकें ,वहां किसी न किसी का दरवाजा तो होगा ही ।और फिर शहर भी इतने बड़े होगये हैं कि म्युनिसिपल्टी वालों तक को उससे बाहर जा कर कचरा फैकना एक समस्या हैं ।फिर अबतो शहर के बाहर भी निर्जन स्थान कहाँ ?
           वास्तव में जो जितना सभ्य है ,वो उतना ही खतरनाक कचरा करता है ।विकसित देश अपने परमाणु परीक्षण महासागर में करते हैं ,इससे वे खुद तो रेडियो धर्मी कचरे से बचे रहते हैं ,महासागर वाले द्वीप ,और जीव -जंतु प्रभावित होते हैं ,तो हों ।उन्होंने अंतरिक्ष को भी नहीं छोड़ा ,चन्द्रमा को भी नहीं और तो और अब मंगल के बारे में प्रयास कर रहे हैं ।सोचने वाली  बात ये है कि जो रसायन ,मशीनरी ,दवाइयां और हथियार उनके यहाँ प्रतिबंधित हैं कचरा हैं उनको वे हमारे जैसे देशों को बड़े एहसान से निर्यात कर रहे हैं और हम उनके इस कचरे के लिए लार टपका रहे हैं ।
            इस भौतिक कचरे के अलावा एक अन्य प्रकार का अमूर्त कचरा भी होता है ।जिसकी आजकल बहुत चर्चा है ।यह कचरा मन -मस्तिष्क को प्रभावित करता है । पुरातनपंथी इसे सांस्क्रतिक प्रदुषण कि संज्ञा देते हैं । उनके अनुसार यह प्रदूषण समाज में अनाचार -और भ्रष्टाचार जैसी बीमारियां फैलाता है ।किन्तु आधुनिक उदारमान सज्जन इसे बुरा नहीं समझते बल्कि अन्य कचरे की भांति इसे भी उन्नति का रूप समझते हैं ।
               उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कचरे का उन्नति से सीधा संबंध है , तो उन्नतिशील कहलाने के लिए आओ हम सब मिलकर खूब कचरा करें ।
                                    
                                     ।।बुरा न मनो होली है ,मान भी जाओ तो ..... हुड्दंगा है ।।